Amavasya / Amavashya /New Moon Dates,Time and Story in 2020

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bhado amavshya ka rahasya
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जाने साल 2020 में किन किन तारीखों को पड़ रही हैं अमावस्या, पितृ कार्यों के लिए मानी जाती है बेहद शुभ:

Amavasya 2020 year Dates List- हिंदू धर्म में अमावस्या का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। नए साल यानी साल 2020 में दो सोमवती अमावस्या, एक मौनी अमावस्या के साथ एक सर्व पितृ अमावस्या  पड़ रही है। बता दें, अमावस्या को पितृ कार्यों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या तिथि के दिन पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को मुक्ति प्राप्त होती है। आइए जानते हैं साल 2020 में आखिर किस-किस दिन पड़ेगी अमावस्या।

 

भादो अमावस्या
भादो अमावस्या

-24 जनवरी 2020 शुक्रवार को माघ अमावस्या 2020/ मौनी अमावस्या पड़ रही है। यह तिथि सुबह 2 बजकर 17 मिनट से अगले दिन 25 जनवरी को सुबह 3 बजकर 11 मिनट तक रहने वाली है।

-23 फरवरी 2020 रविवार, को फाल्गुन अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 22 जनवरी 2020 शाम 7 बजकर 3 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 23 जनवरी 2020 सुबह 3 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होने वाली है।

-24 मार्च 2020 मंगलवार, को चैत्र अमावस्या,भौमवती अमावस्या अमावस्या पड़ रही है। यह तिथि 23 मार्च 2020 रात 12 बजकर 30 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 23 मार्च 2020 सुबह 2 बजकर 57 मिनट पर समाप्त हो रही है।

-22 अप्रैल 2020 बुधवार, को वैशाख अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 22 अप्रैल 2020 सुबह 5 बजकर 37 मिनट से आरंभ होकर 23 अप्रैल 2020 अगले दिन सुबह 7 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी।

-22 मई 2020 शुक्रवार, को  ज्येष्ठ अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 21 मई रात 9 बजकर 35 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 22 मई रात 11 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी।

-21 जून 2020 रविवार, को आषाढ़ अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 20 जून सुबह 11 बजकर 52 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 21 जून सुबह 12 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी।

-20 जुलाई 2020 सोमवार, को श्रावण अमावस्या ,हरियाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या रात 12 बजकर 10 मिनट से रात 11 बजकर 2 मिनट तक आरंभ रहेगी।

-19 अगस्त 2020 बुधवार, को भाद्रपद अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 18 अगस्त 2020 सुबह 10 बजकर 39 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 19 अगस्त सुबह 8 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी।

-17 सितंबर 2020 बृहस्पतिवार, को अश्विन अमावस्या ,महाअमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 16 सितंबर शाम 7 बजकर 56 मिनट से आरंभ होकर 17 सितंबर शाम 4 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगी।

-16 अक्टूबर 2020 शुक्रवार, को अश्विन अधिक अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 16 अक्टूबर 2020 को सुबह 4 बजकर 52 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 17 अक्टूबर सुबह 1 बजकर 01 मिनट पर समाप्त होगी।

-15 नवबंर 2020 रविवार, को कार्तिक अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 14 नवबंर को रात 2 बजकर 17 मिनट से आरंभ होकर 15 नवबंर 2020 सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक रहेगी।

-14 दिसंबर 2020 सोमवार, को मार्गशीष अमावस्या, सोमवती अमावस्या पड़ रही है। जो 14 दिसंबर दोपहर 12 बजकर 44 मिनट से 9 बजकर 46 मिनट तक रहेगी।

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अमावस्या के पर्व/व्रत:

भाद्रपद अमावस्या के दिन पोला मनाया जाता है।

कार्तिक अमावस्या के दिन दीपावली पर्व मनाया जाता हैं।

शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को #शनिचरी अमावस्या कहते है

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हिन्दु पञ्चांग में अमावस्या का दिन वो दिन होता है जिस दिन चंद्रमा को नहीं देखा जा सकता है। चंद्रमा 28 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर पूर्ण करता है।15 दिनों के चंद्रमा पृथ्वी की दूसरी ओर होता है और भारतवर्ष से उसको नहीं देखा जा सकता है।

वही जिस दिन, जब चंद्रमा पुर्ण रूप से भारतवर्ष नहीं देखा जा सकता है उसे अमावस्या का दिन कहा जाता है। अमावस्या को हिन्दु शास्त्रों में काफी महत्वपुर्ण स्थान प्राप्त है और इसके अनुसार अमावस्या को पित्रों अर्थार्थ गुज़र गए पूर्वजों का दिन भी मन जाता है।

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ऐसा कहा जाता है की अमावस्या के दिन स्नान कर प्रभुः का ध्यान करना चाहिये, बुरे व्यसनों से दूर रहना चाहिए और हो सके तो गरीब, बेसहारा और जरूतमंद बुज़ुर्गों को भोजन करना चाहिये।

जैसा की पहले बताया गया है अमावस्या को पित्रों का दिन कहा गया है तो इस दिन किसी को भोजन करने से हम एक तरह से अपने पित्रों को भोजन अर्पित कर रहे हैं। ऐसा करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

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हिन्दू धर्म में पूर्णिमा, अमावस्या और ग्रहण के रहस्य को उजागर किया गया है। इसके अलावा वर्ष में ऐसे कई महत्वपूर्ण दिन और रात हैं जिनका धरती और मानव मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनमें से ही माह में पड़ने वाले 2 दिन सबसे महत्वपूर्ण हैं- पूर्णिमा और अमावस्या।

पूर्णिमा और अमावस्या के प्रति बहुत से लोगों में डर है। खासकर अमावस्या के प्रति ज्यादा डर है। वर्ष में 12 पूर्णिमा और 12 अमावस्या होती हैं। सभी का अलग-अलग महत्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार माह के 30 दिन को चन्द्र कला के आधार पर 15-15 दिन के 2 पक्षों में बांटा गया है- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। शुक्ल पक्ष के अंतिम दिन को पूर्णिमा कहते हैं और कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस्या।

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हिन्दू पंचांग की अवधारणा:

यदि शुरुआत से गिनें तो 30 तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।

अमावस्या पंचांग के अनुसार माह की 30वीं और कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है जिस दिन कि चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता। हर माह की पूर्णिमा और अमावस्या को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता ताकि इन दिनों व्यक्ति का ध्यान धर्म की ओर लगा रहे। लेकिन इसके पीछे आखिर रहस्य क्या है? आओ जानते हैं :

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नकारात्मक और सकारात्मक शक्तियां :

धरती के मान से 2 तरह की शक्तियां होती हैं- सकारात्मक और नकारात्मक, दिन और रात, अच्छा और बुरा आदि। हिन्दू धर्म के अनुसार धरती पर उक्त दोनों तरह की शक्तियों का वर्चस्व सदा से रहता आया है। हालांकि कुछ मिश्रित शक्तियां भी होती हैं, जैसे संध्या होती है तथा जो दिन और रात के बीच होती है। उसमें दिन के गुण भी होते हैं और रात के गुण भी।

इन प्राकृतिक और दैवीय शक्तियों के कारण ही धरती पर भांति-भांति के जीव-जंतु, पशु-पक्षी और पेड़-पौधों, निशाचरों आदि का जन्म और विकास हुआ है। इन शक्तियों के कारण ही मनुष्यों में देवगुण और दैत्य गुण होते हैं।

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हिन्दुओं ने सूर्य और चन्द्र की गति और कला को जानकर वर्ष का निर्धारण किया गया। 1 वर्ष में सूर्य पर आधारित 2 अयन होते हैं- पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। इसी तरह चंद्र पर आधारित 1 माह के 2 पक्ष होते हैं- शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।

इनमें से वर्ष के मान से उत्तरायण में और माह के मान से शुक्ल पक्ष में देव आत्माएं सक्रिय रहती हैं, तो दक्षिणायन और कृष्ण पक्ष में दैत्य और पितर आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं। अच्छे लोग किसी भी प्रकार का धार्मिक और मांगलिक कार्य रात में नहीं करते जबकि दूसरे लोग अपने सभी धार्मिक और मांगलिक कार्य सहित सभी सांसारिक कार्य रात में ही करते हैं।

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अमावस्या : वर्ष के मान से उत्तरायण में और माह के मान से शुक्ल पक्ष में देव आत्माएं सक्रिय रहती हैं तो दक्षिणायन और कृष्ण पक्ष में दैत्य आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं। जब दानवी आत्माएं ज्यादा सक्रिय रहती हैं, तब मनुष्यों में भी दानवी प्रवृत्ति का असर बढ़ जाता है इसीलिए उक्त दिनों के महत्वपूर्ण दिन में व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को धर्म की ओर मोड़ दिया जाता है।

अमा‍वस्या के दिन भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य ज्यादा सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। ऐसे दिन की प्रकृति को जानकर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। प्रेत के शरीर की रचना में 25 प्रतिशत फिजिकल एटम और 75 प्रतिशत ईथरिक एटम होता है।

इसी प्रकार पितृ शरीर के निर्माण में 25 प्रतिशत ईथरिक एटम और 75 प्रतिशत एस्ट्रल एटम होता है। अगर ईथरिक एटम सघन हो जाए तो प्रेतों का छायाचित्र लिया जा सकता है और इसी प्रकार यदि एस्ट्रल एटम सघन हो जाए तो पितरों का भी छायाचित्र लिया जा सकता है।

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ज्योतिष में चन्द्र को मन का देवता माना गया है। अमावस्या के दिन चन्द्रमा दिखाई नहीं देता। ऐसे में जो लोग अति भावुक होते हैं,उन पर इस बात का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। लड़कियां मन से बहुत ही भावुक होती हैं। इस दिन चन्द्रमा नहीं दिखाई देता तो ऐसे में हमारे शरीर में हलचल अधिक बढ़ जाती है। जो व्यक्ति नकारात्मक सोच वाला होता है उसे नकारात्मक शक्ति अपने प्रभाव में ले लेती है।

धर्मग्रंथों में चन्द्रमा की 16वीं कला को ‘अमा‘ कहा गया है। चन्द्रमंडल की ‘अमा’ नाम की महाकला है जिसमें चन्द्रमा की 16 कलाओं की शक्ति शामिल है। शास्त्रों में अमा के अनेक नाम आए हैं,जैसे अमावस्या,सूर्य-चन्द्र संगम,पंचदशी, अमावसी,अमावासी या अमामासी।

अमावस्या के दिन चन्द्र नहीं दिखाई देता अर्थात जिसका क्षय और उदय नहीं होता है उसे अमावस्या कहा गया है, तब इसे ‘कुहू अमावस्या’ भी कहा जाता है। अमावस्या माह में एक बार ही आती है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है। इस दिन दोनों ही एक ही राशि में रहते हैं।

कुछ मुख्‍य अमावस्या : भौमवती अमावस्या,मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सोमवती अमावस्या,सर्वपितृ अमावस्या।

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चेतावनी : इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं। जानकार लोग तो यह कहते हैं कि चौदस, अमावस्या और प्रतिपदा उक्त 3 दिन पवित्र बने रहने में ही भलाई है।

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